पहाड़ की विकास व्यथा | बुंगा बीर काटल गाँव के लोग खुद बना रहे सड़क

रिपोर्ट: सौरभ सिंह बिष्ट

ख़ास बात:

  • सरकार के विकास का आईना – सड़क तक नहीं यहाँ
  • पौड़ी के बुंगा बीर काटल गाँव तक नहीं कोई सड़क
  • ग्रामीण खुद बने अपने मांझी, बना रहे 3.5 किमी सड़क  
  • पहाड़ का सीना चीर, बना रहे गाँव के लिए सड़क

पौड़ी: “अब पहुंची हो सड़क तुम गाँव, जब पूरा गाँव शहर जा चुका है” – महेश चंद्र पुनेठा की ये पंक्तियां आज़ाद भारत की धीमी गति के विकास को आईना दिखा रही है। इन पंक्तियों से कवि पहाड़ की व्यथा सामने रख रहे हैं कि विकास की गति इतनी धीमी है, कि जब तक ये सड़क गांव पहुंची है, तब तक तो पूरा गांव शहर जा चुका है।

आज भी पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड के अधिकांश गांव सड़क, बिजली व सुविधाओं का टकटकी लगा कर इंतजार कर रहे हैं।

मैदानी इलाक़ों की चुनौतियों से परे होती हैं पहाड़ सी ऊंचे क़द के साथ खड़ी चुनौतियाँ जो यहाँ की भौगोलिक स्थिति के चलते और भी  विशालकाय प्रतीत होती हैं।

पहाड़ में सड़क बनाना – मतलब चट्टानों का सीना चीरते हुए, जहाँ एक व्यक्ति के चलने की भी जगह ना हो वहां गाड़ी के जाने के लायक रास्ता तैयार करना। ये ज़िक्र सुनकर आपके ज़हन में ज़रूर एक तस्वीर उभरी होगी और दशरथ मांझी की याद भी ज़रूर आई होगी। दशरथ मांझी – जिन्हें ‘माउंटेन मैन’ के नाम से जाना जाता है और जिन्होंने अपनी छैनी हथौड़ी से ही पहाड़ में रास्ता बना डाला।

कुछ ऐसे ही हौसले से रूबरू अराते हैं आपको, ले चलते हैं आपको एक ऐसे गांव की ओर जहाँ के लोगों ने यह तो साबित कर दिया कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो मंज़िल पाने के लिए किसी का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं।

पौड़ी ज़िले के यमकेश्वर ब्लॉक् का ये गाँव बुंगा बीर काटल – जहां के युवाओं ने वैश्विक महामारी के चलते लॉक डाउन में खाली घर बैठने की बजाए फैसला किया अपने गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने का। इन युवाओं ने यहाँ के पंचायत सदस्य सुदेश भट्ट के नेतृत्व में 3.5 किलोमीटर के मार्ग का निर्माण करने का फैसला किया।

और हौसले के साथ कर्त्तव्य परायणता की मिसाल ऐसी कि बीर काटल गांव के लोग सड़क बनाने के लिए लॉक डाउन के नियमों पूरा पालन करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग व ज़रूरी बचाव के नियमों का पालन करते हुए इस काम को अंजाम दे रहे हैं। सड़क को अपने गांव तक पहुंचाने का जज़्बा यहां सिर्फ युवाओं में ही नहीं बुज़ुर्गों में भी देखा जा सकता है जिसके चलते गांव के हर उम्र वर्ग के लोग इस कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं।

आपको बता दें कि यहाँ सड़क बनाने से मतलब यह कतई नहीं है कि सड़क के खड्डे भरे जा रहे हैं या सड़क को समतल किया जा रहा है। यहां सड़क बनाने से मतलब है ठोस पत्थरों से दो-चार होना। जैसे मांझी के लिए रास्ता बनाना मुश्किल था, वैसे ही सड़क बनाना यहाँ भी बहुत ही चुनौतीपूर्ण होने वाला है। लेकिन गांव वालों के जज़्बे को देखते हुए लगता है की सभी चुनौतियों का डटकर सामना किया जाएगा और ये लोग अपने प्यारे गांव तक सड़क पहुंचा कर ही सांस लेंगे।

सुदेश बताते हैं कि सड़क बनाने के रास्ते में कई प्रकार की चुनौतियां आ रही है जैसे कई जगह पर पहाड़ नहीं खोदा जा सकता, तो उस स्थान की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए वहां पर पुस्ते बनाए जा रहे हैं ओर सड़क को चौड़ा किया जा रहा है।

आगे चलकर इसी रास्ते में एक बरसाती नाला जिसको पहाड़ी में गधेरा भी बोलते हैं वह इनका रास्ता रोके खड़ा है जिस पर गांव वालों ने एक टेंपरेरी पुल खम्बों की मदद से बनाया है। लेकिन अब सड़क बनने की स्थिति में उसको भी पक्का करना पड़ेगा। फिलहाल गांव वालों ने दो से तीन हफ़्तों में इस रास्ते को छोटी गाड़ियों दोपहिया वाहनों के लिये तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

इसके बाद छोटी फोरव्हीलर के लिये भी बनाया जायेगा जिस से ग्रामीण बताते है कि गांव में बेटियों की शादी के लिये बारात आने में आसानी होगी। सड़क न होने की वजह से पहाड़ो में शादी-ब्याह होने में व मरीज़ों व गर्भवती महिलाओं को हॉस्पिटल ले जाने में काफी मशक्क़त करनी पड़ती है। कई बार देर भी हो जाती है जिस से जान का नुकसान भी हो जाता है।

सुदेश ने बताया की एक बार सड़क का कार्य पूरा होने के बाद फिर वे गांव में सिंचाई के लिए टूटी हुई नहरों को दोबारा बनाएंगे। उन्होंने बताया कि आपदा के दौरान व बरसाती मौसम में सभी नहरें टूट कर नष्ट हो चुकी हैं जिसकी वजह से गांव में खेती कर पाना बेहद मुश्किल हो रहा है ।उन्होंने बताया कि यह पूरा क्षेत्र काफी उपजाऊ है और सब्जियों के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहाँ की सब्जियों से पूरे ब्लॉक को सप्लाई की जाती थी, लेकिन अब सिंचाई न होने के कारण यहां खेती करना भी मुश्किल हो गया है।

इन सभी प्रयासों को देखकर जहाँ हमारे सर इनके हौसले के सामने नतमस्तक होते हैं, हम उम्मीद करते हैं कि प्रदेश सरकार और प्रशासन इनकी मदद को आये और ऐसी कई कहानियों का सुखद अंत हो।

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