हरिद्वार | करीब चार साल पुराने हरीश रावत सरकार के गंगा एस्केप चैनल शासनादेश को राज्य सरकार ने रद्द कर दिया है। त्रिवेंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस शासनादेश को ‘जल्दी’ निरस्त करने की बात कही थी।

हर की पैड़ी पर एस्केप चैनल का शासनादेश रद्द, गंगा प्रेमियों में खुशी की लहर

अंततः सरकार की यह ‘जल्दी’ चार साल में पूरी हुई। हरीश रावत सरकार ने दिसंबर 2016 में हरिद्वार के होटल कारोबारियों को कोर्ट और एनजीटी के आदेशों से बचाने के लिए एक तीसरा मार्ग निकालते हुए गंगा को नहर घोषित कर दिया था। गंगा के सरकारी नामांतरण से हरिद्वार में गंगा किनारे बने हुए सभी नये होटल ध्वस्तीकरण से बच गए थे।

लेकिन इसे संयोग ही कहें कि इसके तत्काल बाद हुए विधानसभा चुनाव में हरीश सरकार ध्वस्त हो गई थी। लेकिन हरीश रावत सरकार के इस विवादित शासनादेश से हरिद्वार में हर की पैड़ी की गंगा धारा पर ही सवाल खड़ा हो गया था। क्योंकि सरकार के शासनादेश के बाद हर की पैड़ी पर जो गंगा करोड़ों लोगों की आस्था का पर्याय थी, वो अब एक नहर हो गई थी।

गंगा की धारा को एस्केप चैनल बताने वाले शासनादेश रद्द करने की मांग तेज़

प्रसिद्ध कुंभ, अर्द्धकुंभ का आयोजन हर की पैड़ी स्थित ब्रह्मकुंड पर ही होता है। तमाम धार्मिक कर्मकांड भी यहीं होते हैं। हरीश सरकार के फैसले के बाद इन तमाम आयोजनों की धार्मिक “वैधता” पर सवाल खड़े होने लगे थे।

मार्च 2017 में मुख्यमंत्री के रुप में गंगापूजन के लिए हरकीपैड़ी पहुंचे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत से तब पुरोहितों ने हरीश सरकार के शासनादेश को रद्द करने की मांग की थी। जिस पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने हरीश सरकार के फैसले को गलत बताते हुए इसे जल्दी निरस्त करने का आश्वासन पुरोहितों व हर की पैड़ी की प्रबंधकारिणी गंगासभा को दिया था।

2016 में एस्केप चैनल घोषित हुई गंगा की धारा; शासनादेश रद्द करने की मांग

लेकिन सरकार की यह ‘जल्दी’ पौने चार साल लंबी खिंच गई। इस दौरान इस मुद्दे को लेकर गंगासभा, पुरोहितों, संतों न नागरिक संगठनों के आंदोलन हुए। हर की पैड़ी पर विगत 62 दिनों से युवा पुरोहित एस्केप चैनल समाप्ति की मांग को लेकर आंदोलनरत थे। जिसके बाद अब जाकर सरकार ने गंगा के स्कैप चैनल नाम को निरस्त किया है।

’पहले से तय था घोषणा का दिन’

एस्केप चैनल नाम समाप्ति में राजनीति का भी रोल रहा है। असल में सरकार का यह निर्णय पूर्व नियोजित था। हरिद्वार में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी चार दिन पूर्व ही कह चुके थे कि सरकार 22 तारीख को इस शासनादेश को निरस्त कर सकती है।

हर की पैड़ी पर युवा पुरोहित दो महीने से इसको लेकर आंदोलन कर रहे थे। जबकि गंगासभा इस आंदोलन से अलग बनी हुई थी। हर की पैड़ी पर आंदोलनरत पुरोहितों को केंद्रीय मंत्री निशंक के खेमे का माना जाता है। जबकि गंगासभा के ज्यादातर पदाधिकारी नगर विकास मंत्री मदन कौशिक के निकटस्थ हैं। हरिद्वार में सत्ता की राजनीति के इन दो ध्रुवों की खींचतान किसी से छिपी नहीं है।

सरकार के रुख पर ही गंगासभा ने एस्केप चैनल की समाप्ति को लेकर कोई कठोर कदम नहीं उठाया। मुख्यमंत्री की एस्केप चैनल शासनादेश निरस्त करने की घोषणा के वक्त भी केवल नगर विकास मंत्री, संत और गंगासभा के पदाधिकारी ही मौजूद रहे।

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