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राजनीतिक दलों के एजेंडे में आखिर पर्यावरण मुद्दा क्यों नहीं

देहरादून | उत्तराखंड में पांचवीं विधानसभा चुनाव के लिए रणभेरी बज चुकी है। राजनीतिक दलों ने राज्य के 81.43 लाख भाग्य विधाता मतदाताओं को लुभाने के लिए तमाम मुद्दे उछालने भी शुरू कर दिए हैं, लेकिन एक बात हर किसी को कचोट रही है। वह ये कि राजनीतिक दलों के एजेंडे में पर्यावरण मुद्दा क्यों नहीं। वह भी तब जबकि नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण उत्तराखंड देश के पर्यावरण को संजोये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इस दृष्टि से नजर दौड़ाएं तो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 71.05 प्रतिशत वन भूभाग है। प्रकृति की ओर से वन रूपी अमूल्य निधि यहां की सभ्यता, संस्कृति व समृद्धि का प्रतीक है। वन प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगाने के साथ ही पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के साथ ही जलवायु को संयत रखते हैं। यहां के वन नाना प्रकार की जीवनदायिनी जड़ी-बूटियों का बड़ा भंडार भी हैं। भूमि व जल संरक्षण और वन्यजीवों में वनों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।

पर्यावरण संरक्षण में राज्य के योगदान पर चर्चा करें तो आक्सीजन का विपुल भंडार यह राज्य देश को तीन लाख करोड़ से अधिक की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले वनों की भागीदारी सालाना एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। यही नहीं, राज्य में पर्यावरण का मतलब पर्यटन के जरिये यहां की आर्थिकी से भी जुड़ा है। दूसरा पहलू ये भी है कि पर्यावरण और विकास के मध्य सामंजस्य का अभाव प्रदेश पर भारी पड़ रहा है। इस परिदृश्य के बीच राजनीतिक दलों के बीच पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे की अनदेखी को किसी भी दशा में ठीक नहीं कहा जा सकता।

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